- भारत के संविधान में मौलिक अधकारों को संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है। इसका वर्णन संविधान के भाग-3 में (अनुच्छेद 12 - 35) है। इसे मूल अधिकारों का जन्म दाता भी कहा जाता है। संविधान के भाग - 3 को भारत का अधिकार पत्र भी कहा जाता है।
- मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे, लेकिन 44वें संविधान संशोधन (amendment) (1989 ई0) के द्वारा संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31 एवं 19क) को मौलिक अधिकार की सूची से हटा कर इसे संविधान के अनुच्छेद 300 (a) के अंतर्गत कानूनी अधिकार के रूप में रखा गया है।
- 1931 ई0 में करांची अधिवेशन (अध्यक्ष सरदार बल्लभ भाई पटेल) में कांग्रेस ने घोषणा पत्र में मूल अधिकारों की मांग की।
- अधिकारों का प्रारूप पं0 जवाहर लाल नेहरू ने बनाया था।
मूल अधिकार
1. समानता या समता का अधिकार (अनु0 14 से 18)
अनुच्छेद 15 : धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
अनुच्छेद 18 : उपाधियों का अंत।
अनुच्छेद 15 : धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
अनुच्छेद 18 : उपाधियों का अंत।
2. स्वतंत्रा का अधिकार (अनु0 19 से 22)
- सूचना अधिकार अधिनियम वर्ष 2005 में लागू हुआ।
- शब्द चौथी सत्ता का प्रयोग प्रेस और समाचार के लिए होता है।
- 1 अप्रैल, 2010 को शिक्षा का अधिकार अधिनियम बन गया और इसे पूरे देश में लागू किया गया।
3. शोषण के विरूद्ध अधिकार (अनु0 23 से 24)
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनु0 25 से 28)
5. संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनु0 29 से 30)
6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनु0 32)
- संवैधानिक उपचारों के अधिकार को डॉ0 भीमराव अम्वेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है।
- अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मौलिक अधकारों को प्रवर्तित (बढ़ाना, वृद्धि करना) कराने के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में आवेदन करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
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